मन-मति !
जब कुछ कहता है मन -
22 April, 2023
अनथक !
14 April, 2023
मुझे कुछ भी पसंद नहीं !
मुझे चांद से कहना है कि
तुम जब मध्य में होते हो
तो मुझे पसंद नहीं;
मुझे फूलों से कहना है कि
तुम जब खिल जाते हो
तो मुझे पसंद नहीं;
मुझे रंगों से कहना है कि
तुम जब घुल जाते हो
तो मुझे पसंद नहीं;
मुझे खुद से कहना है
जब मैं तुम्हारे करीब होता हूँ
तो मुझे कुछ भी पसंद नहीं !
31 July, 2022
'मानव' और 'श्रेष्ठ मानव' !
मानवों के बीच में बंटवारा होता है;
कुछ लोगों को मानव की श्रेणी में रखा गया
और कुछ लोगों को 'श्रेष्ठ मानव' की श्रेणी में,
कुछ लोग इस बंटवारें से खुश नहीं थे,
वे लड़ना चाहते थे;
लेकिन बंटवारा करने वाले लोग अज्ञात दिशाओं में भाग गए,
कुछ लोगों का कहना है कि वे ईश्वर थे;
कुछ लोगों का मानना है कि वे अवतार थे;
कुछ लोगों का विश्वास है कि वे संतान थे;
कुछ लोगों की मान्यता है कि वे दूत थे,
लड़ाई आज भी जारी है,
कुछ लोग बंटवारे के पक्षधर हैं
और कुछ इसके खिलाफ,
ये लड़ाई अब तक अविजित है।
सहस्त्र वर्षों बाद कुछ लोग इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि
वे लोग अब भी हमारे बीच में रह रहे हैं;
वे मुखोटों में रहते हैं,
और अब उनको बेनकाब करने की जरूरत है।
© महेन्द्र ‘आज़ाद’
28 July, 2022
बतौ द ! हे सरकार ?
(जोशीमठ का हेलंग गौं मा घसेरी कु घास सिपे अर अधिकारी लोगोंन छीन दीनी, ये बुरा बकत मा जब जल-जंगल-जमीन से जनता कु अधिकार लगातार छीनी जाण्या च त सरकार से कुछ सवाल)
भूका डंगरों का गिचा पर म्वोल कन के लगोंण
मिन
अपणा गौड़ी-भैंसी, बल्द-बखरा कख चरौंण
बतौ
द ! हे सरकार ?
बतौ
द ! हे सरकार ?
(भूखे
जानवरों के मुँह पर मोहरी कैसे लगाऊं
मैं
अपने गाय-भैंस, बैल-बकरियां कहाँ चुगाउँ
बताओ
तो ! हे सरकार ?
बताओ
तो ! हे सरकार ?)
पुरखों कु पौराई बणों मा कतक्या
पीढ़ी पली गेनी
अब किले
मेरु घास तुमारा ख़्वारों मा पीडांण लेगी
बतौ
द ! हे सरकार ?
बतौ
द ! हे सरकार ?
(पुरखों
द्वारा संरक्षित वन में कितनी ही पीढ़ी पल गई
अब क्यों
मेरा घास तुम्हारे दिमागों में चुभने लग गई
बताओ
तो ! हे सरकार ?
बताओ
तो ! हे सरकार ?)
मि एक घस्यारी छौं, क्वि घुसपैठ नि करी मिन
किले तुमारा पुलिस अर फ़ौजी मेरा पिछ्याड़ी पड़ गिन
बतौ
द ! हे सरकार ?
बतौ
द ! हे सरकार ?
(मैं एक घस्यारी हूँ,
हम कोई घुसपैठ नहीं किये
क्यों तुम्हारे पुलिस और फौजी मेरे पीछे पड़ गए
बताओ
तो ! हे सरकार ?
बताओ
तो ! हे सरकार ?)
सरकारी जमीन पर जब कंपनी कु राज़ ह्वे जालू
त क्या हम मन्ख्यूँ ते इनि बेदखल करी जालू
बतौ
द ! हे सरकार ?
बतौ
द ! हे सरकार ?
(सरकारी जमीन पर जब कंपनी का राज़ हो जाएगा
तो क्या हम इंसानों को ऐसे ही बेदखल किया जाएगा
बताओ
तो ! हे सरकार ?
बताओ
तो ! हे सरकार ?)
पर ये भी बतावा जब बिक जालू सेरू पहाड़
हम पहाड़ी रैवासियूँन बासा रौंण के गाड़
बतौ
द ! हे सरकार ?
बतौ
द ! हे सरकार ?
(और ये भी बताओ जब बिक जाएगा सारा पहाड़
हम पहाड़ी रहवासियों ने रात बितानी है किस गाड़
बताओ
तो ! हे सरकार ?
बताओ
तो ! हे सरकार ?)
महेन्द्र ‘आज़ाद’
17/07/2022
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( जोशीमठ का हेलंग गौं मा घसेरी कु घास सिपे अर अधिकारी लोगोंन छीन दीनी , ये बुरा बकत मा जब जल - जंगल - जमीन से जनता कु अधिकार लगातार छीनी जाण...
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म ुझे चांद से कहना है कि तुम जब मध्य में होते हो तो मुझे पसंद नहीं; मुझे फूलों से कहना है कि तुम जब खिल जाते हो तो मुझ...
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मैंने देखे सपने एक के बाद एक और देखते रहा जब जागा एक दिन तो पाया पीठ पर थी सपनों की गठरी जो बन चुका मेरा कूबड़ अब चाह कर भी न उतरे अब थक गय...



