22 April, 2023

अनथक !

 



मैंने देखे सपने
एक के बाद एक
और देखते रहा

जब जागा एक दिन
तो पाया पीठ पर
थी सपनों की गठरी
जो बन चुका मेरा कूबड़

अब चाह कर भी न उतरे
अब थक गया हूँ
सफ़र के मध्य में

एक भंवर है
और उसमें मैं

अब रोज़ कोशिश करता हूँ
कि थकान न महसूस हो !


© महेन्द्र 'आज़ाद'

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