मैंने देखे सपने
एक के बाद एक
और देखते रहा
जब जागा एक दिन
तो पाया पीठ पर
थी सपनों की गठरी
जो बन चुका मेरा कूबड़
अब चाह कर भी न उतरे
अब थक गया हूँ
सफ़र के मध्य में
एक भंवर है
और उसमें मैं
अब रोज़ कोशिश करता हूँ
कि थकान न महसूस हो !
© महेन्द्र 'आज़ाद'
मुझे चांद से कहना है कि
तुम जब मध्य में होते हो
तो मुझे पसंद नहीं;
मुझे फूलों से कहना है कि
तुम जब खिल जाते हो
तो मुझे पसंद नहीं;
मुझे रंगों से कहना है कि
तुम जब घुल जाते हो
तो मुझे पसंद नहीं;
मुझे खुद से कहना है
जब मैं तुम्हारे करीब होता हूँ
तो मुझे कुछ भी पसंद नहीं !